🌸 श्री राधा अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी | श्री राधा रानी का पावन प्राकट्य उत्सव
सनातन धर्म में राधा अष्टमी का पर्व अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) के ठीक 15 दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बरसाने में साक्षात ह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। मान्यता है कि राधा जी की पूजा के बिना श्री कृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है। कहते हैं जो कोई भी व्यक्ति राधा अष्टमी पर सच्चे मन से व्रत रख कर विधि विधान से राधा रानी की पूजा करता है उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
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📖 पौराणिक व्रत कथा: श्री राधा रानी का दिव्य प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री राधा जी माता के गर्भ से पैदा नहीं हुई थीं, बल्कि उनका प्राकट्य दिव्य और अलौकिक रूप से हुआ था। ब्रज मंडल में वृषभानु जी नाम के एक परम प्रतापी और धार्मिक राजा (गोप) रहते थे, जिनकी पत्नी का नाम कीर्ति कुमारी था। वे परम वैष्णव और दयालु स्वभाव के थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी।
एक बार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राजा वृषभानु भोर के समय यज्ञ की भूमि साफ करने और स्नान के लिए एक पवित्र सरोवर (जिसे आज रावल या कमल सरोवर कहा जाता है) के पास से गुजर रहे थे। तभी उन्हें सरोवर के बीचों-बीच खिले एक अत्यंत विशाल और सुंदर सुनहरे कमल के फूल पर दिव्य प्रकाश दिखाई दिया।
जब राजा कौतूहलवश सरोवर के निकट गए, तो उन्होंने देखा कि उस कमल के दल पर एक परम सुंदरी, कन्या के रूप में नवजात शिशु लेटी हुई थी, जिसके शरीर से करोड़ों सूर्यों के समान कांति निकल रही थी। वृषभानु जी उस दिव्य कन्या को देखकर आनंद से भर गए और उसे अपनी गोद में उठाकर महल ले आए। रानी कीर्ति ने जब उस अलौकिक कन्या को देखा, तो उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। उन्होंने इसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर बड़े लाड-प्यार से पालना शुरू किया।
लेकिन राजा और रानी इस बात से चिंतित थे कि वह कन्या जन्म से ही अपनी आंखें नहीं खोल रही थी। कुछ समय बाद, जब गोकुल से नंद बाबा, यशोदा मैया और बाल कृष्ण राजा वृषभानु के घर बधाई देने आए, तब एक अद्भुत चमत्कार हुआ।
जैसे ही नन्हें बाल कृष्ण को उस कन्या के पालने के पास ले जाया गया, पालने में लेटी दिव्य कन्या ने तुरंत अपनी आंखें खोल दीं। उन्होंने सबसे पहले अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण के दर्शन किए। वह अलौकिक कन्या और कोई नहीं, साक्षात गोलोक की स्वामिनी श्री राधा जी थीं। इसके बाद पूरे ब्रजमंडल में उत्सव मनाया गया और बरसाना आनंद के सागर में डूब गया।
🪔 राधा अष्टमी व्रत के मुख्य नियम व मध्याह्न पूजा विधि
- मध्याह्न पूजा का महत्व: चूंकि राधा जी का प्राकट्य दोपहर के समय (मध्याह्न काल) में हुआ था, इसलिए इस व्रत की मुख्य पूजा दोपहर 11:30 से 01:30 के बीच की जाती है।
- अभिषेक और श्रृंगार: इस दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं। राधा रानी को विशेष रूप से नीले या पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें और उनका पूर्ण श्रृंगार करें।
- फलाहार और भोग: पूजा में माता राधा को अरबी की सब्जी, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरियां और मालपुए का भोग लगाया जाता है।
- राधा नाम का जप: शास्त्रों के अनुसार, केवल "राधा" नाम के उच्चारण मात्र से ही श्री कृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और साधक के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।
॥ श्री राधा रानी स्तुति मंत्र ॥
तप्तकांचन गौरांगी राधे वृंदावनेश्वरी।
वृषभानु सुते देवी प्रणमामि हरिप्रिये॥

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