कृष्ण भजन
धुंधला सा है मंजर,
आँखों में नमी है।
भीड़ में हूँ दुनिया की,
पर तेरी कमी है।
मैं खुद से ही हारा हूँ,
टूटा हुआ ताराहूँ,
अंधेरों ने घेरा है मुझे,
अब तू ही बता,
किस ओर चलूं,
इस शोर में किससे मैं मिलूं,
मेरी सांस की हर दौर को,
बस तेरा इंतजार है,
ओ रे सारथी....ओ रे सारथी....
मेरे मन के अर्जुन को,
राह दिखा दे...
ओ रे सारथी.....
मेरी डूबती नैया को,
पार लगा दे,
हाथ थाम ले, कैसा मेरा,
हाथ थाम ले....
मोह के धागे, उलझ गए ऐसे,
चक्रव्यूह में, फसा हूँ मैं जैसे...
ये जग है जलावा,
यहाँ सब है पराया,
सच बस वही, जो तूने सिखाया,
मुझे मुझ में तू,
अब कर दे फ़ना,
तेरे चरणों में, मिल जाये पनाह...
ओ रे सारथी....ओ रे सारथी....
मेरे मन के बादल को,
आज हटा दे,
ओ रे सारथी....
इस माटी के पुतले को,
सोना बना दे....
तेरा नाम ही, मेरा सत्य है,
तेरा नाम ही... समर्थिया है,
गोविंदा.....गोविंदा.....
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