पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब दैत्यराज हिरण्याक्ष का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तो उसने अपनी असीमित शक्तियों के मद में आकर पूरी पृथ्वी को अपनी भुजाओं में लपेट लिया और उसे ले जाकर पाताल लोक की अगाध गहराइयों में छुपा दिया। पृथ्वी के अदृश्य हो जाने से समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया। सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि अत्यंत चिंतित होकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।
तभी ब्रह्मा जी की नासिका (नाक) से अचानक एक अंगूठे के आकार का एक छोटा सा वराह शिशु प्रकट हुआ। देखते ही देखते वह विशाल पर्वत के समान विशालकाय वराह (जंगली सूअर) के रूप में बदल गया। भगवान विष्णु के इस अलौकिक वराह रूप की गर्जना से दसों दिशाएँ गूंज उठीं।
भगवान वराह ने बिना समय गँवाए पाताल लोक की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने समुद्र की गहराइयों को चीरते हुए अपनी तीखी दाढ़ों (दांतों) पर पूरी पृथ्वी को बहुत ही संभलकर उठा लिया और ऊपर की ओर आने लगे।
जब हिरण्याक्ष ने भगवान वराह को पृथ्वी ले जाते देखा, तो उसने प्रभु को युद्ध के लिए चुनौती दी। पाताल लोक के भीतर ही भगवान वराह और दैत्य हिरण्याक्ष के बीच एक अत्यंत भयंकर और लंबा युद्ध हुआ। अंत में भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र और गदा के प्रहार से महापापी हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद प्रभु ने जल के ऊपर शेषनाग के मस्तक पर पृथ्वी को पुनः स्थापित किया और समस्त सृष्टि को जीवनदान दिया।

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