सनातन धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत आत्म-शुद्धि और जाने-अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन विशेष रूप से सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ) की पूजा की जाती है।
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प्रथम पौराणिक कथा: ब्राह्मण कन्या की कहानी
भविष्य पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में विदर्भ देश में उत्तंक नाम के एक सदाचारी ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। उनकी एक गुणवती पुत्री थी, जिसका विवाह उन्होंने एक अच्छे ब्राह्मण कुल में किया था। परंतु दैवयोग से विवाह के कुछ समय बाद ही उनके दामाद की अकाल मृत्यु हो गई और पुत्री विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण परिवार गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगा।
एक रात सोते समय पुत्री के शरीर पर अचानक अनगिनत कीड़े रेंगने लगे। बेटी की यह हालत देख माता सुशीला चीख उठी और तुरंत अपने पति उत्तंक को बुलाया। ऋषि उत्तंक ने जब दिव्य दृष्टि से देखा, तो उन्हें सत्य का पता चला।
उन्होंने बताया, "यह हमारी पुत्री के पूर्व जन्म के रजस्वला (मासिक धर्म) दोष का परिणाम है। पूर्व जन्म में इसने मासिक धर्म के दौरान पवित्रता के नियमों का पालन नहीं किया और अशुद्ध अवस्था में भी रसोई व बर्तनों को छुआ। शास्त्रों के अनुसार, रजस्वला स्त्री पहले दिन चांडालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिन के समान अशुद्ध होती है। चौथे दिन स्नान के बाद ही शुद्धि होती है।"
मुक्ति का उपाय:
पिता के आदेशानुसार, कन्या ने पूरे विधि-विधान से ऋषि पंचमी का व्रत रखा और सप्तऋषियों का पूजन कर अपने अपराध की क्षमा मांगी। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से वह पूरी तरह पापमुक्त हो गई और उसे दिव्य कांति प्राप्त हुई।
द्वितीय कथा: बैल और कुतिया की पौराणिक कहानी
एक अन्य कथा के अनुसार, सुमित्र नाम के एक किसान की पत्नी जयश्री ने भी अपने जीवन में रजस्वला नियम का उल्लंघन किया था। इस पाप के कारण अगले जन्म में सुमित्र ने एक बैल के रूप में और जयश्री ने एक कुतिया के रूप में उसी घर में जन्म लिया, जहाँ उनका धर्मात्मा पुत्र सुचित्र रहता था।
एक दिन सुचित्र के घर में पितरों के श्राद्ध का भोजन बन रहा था। तभी एक विषैले सर्प ने खीर के बर्तन में विष छोड़ दिया। कुतिया बनी मां ने अपने बेटे के परिवार को ब्रह्म-हत्या के पाप से बचाने के लिए उस खीर को जूठा कर दिया। गुस्से में आकर सुचित्र की पत्नी ने कुतिया को लाठी से बहुत मारा और उस दिन उसे भोजन भी नहीं दिया।
रात में जब बैल (पिता) और कुतिया (माता) आपस में बात कर रहे थे, तब सुचित्र ने उनकी बातें सुन लीं। वह भागा-भागा ऋषियों के पास गया और माता-पिता के इस कष्ट का कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि पूर्व जन्म में रजस्वला दोष के कारण इनकी यह गति हुई है। तब सुचित्र और उसकी पत्नी ने पूरी श्रद्धा से ऋषि पंचमी का व्रत किया और उसका पुण्य फल अपने पशु माता-पिता को दान कर दिया। इस व्रत के प्रताप से वे दोनों पशु योनि से मुक्त होकर देवलोक को गए।
ऋषि पंचमी व्रत के मुख्य नियम व विधि
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र जल से या मिट्टी लगाकर स्नान का विधान है।
- चौकी पर सप्तऋषियों की स्थापना करें और हल्दी, चंदन, पुष्प व धूप-दीप से पूजन करें।
- सबसे महत्वपूर्ण नियम: इस दिन हल से जोते हुए अनाज (जैसे गेहूं, साधारण चावल) का सेवन वर्जित होता है।
- व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन विशेष रूप से साठी के चावल या पसई धान के चावल का फलाहार ग्रहण करती हैं।
॥ सप्तऋषि ध्यान महामंत्र ॥
कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।।

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