कृष्ण भजन
तुम मुझे ईश्वर कहते हो,
लीला-धारी कहते हो...
पर कभी सोचा है?
जिसको तुमने 'भगवान' माना,
उसने इंसान होकर कितना दर्द सहा?
मेरी बांसुरी की धुन सुनी है तुमने,
पर मेरे हृदय का शोर नहीं सुना।
आज सुनो...
मेरी कहानी, मेरी जुबानी
अंधेरी रात थी,
कारागार मेरा सवेरा था,
जन्म लेते ही अपनों से बिछुड़ना,
ये नसीब मेरा था।
माँ देवकी की गोद भी नसीब न हुई मुझे,
पिता वसुदेव ने टोकरी में छुपाया मुझे।
मत हार मान, मत हार मान...
जब मैं न रोया, तो तू क्यों परेशान?
मैंने कांटों पर चलकर भी मुस्कुराया है,
संघर्ष ही तो जीवन का दूसरा साया है।
बारिश की वो रात,
यमुना का वो उफान,
एक नन्हा सा जीवन,
और मौत का तूफ़ान।
सोचो उस बच्चे पर,
क्या गुज़री होगी?
जिसे जन्म लेते ही,
अपने माँ-बाप को खोना पड़ा...
त्याग की पहली ईंट पर,
मेरा जीवन शुरू हुआ।
गोकुल में आया,
लगा अब चैन मिलेगा,
पर वहां भी मौत ने,
मेरा पीछा न छोड़ा।
कभी पूतना आई ज़हर लेकर,
कभी कालिया का कहर,
बचपन खेलने के लिए था,
पर मैं लड़ता रहा हर पहर।
लोग कहते हैं मैं माखन चोर था,
पर वो मेरी खुशी के चंद पल थे,
शोर नहीं था।
हर दिन एक नई जंग,
हर दिन एक नया वार,
क्या यही होता है,
ईश्वर का अवतार?
मत हार मान, मत हार मान...
जब मैं न रोया, तो तू क्यों परेशान?
मैंने कांटों पर चलकर भी मुस्कुराया है,
संघर्ष ही तो जीवन का दूसरा साया है।
और फिर वो दिन आया...
सबसे कठिन दिन।
वृंदावन छोड़ना था,
राधा को छोड़ना था।
जिन्होंने मुझे पाला,
उस यशोदा-नंद को तोड़ना था।
मैं रोया नहीं...
क्योंकि मुझे दुनिया को,
संभालना था।
पर उस दिन...
कृष्ण का दिल,
कृष्ण ने ही कुचला था।
मैं वापस कभी नहीं गया...
एक बार जो छूटा,
वो हमेशा के लिए छूट गया।
प्रेम का प्रतीक होकर भी,
मैं प्रेम से दूर हुआ।
तो तू क्यों रोता है,
छोटे से दर्द पे इंसान?
मैंने प्रेम खोया, घर खोया,
खोया अपना जहान।
मत हार मान, मत हार मान...
मेरा जीवन ही है,
मेरा सबसे बड़ा प्रमाण।
मथुरा जीता, पर अपनों को मार कर,
द्वारका बनाई, समुद्र के किनार पर।
पर शांति ?
शांति मुझे तब भी न मिली।
महाभारत का युद्ध...
मेरे कंधों पर खड़ा था,
मैं सब जानता था,
कौन मरेगा, क्या होगा...
सबका लहू मेरे हाथों में लिखा था।
अपने ही भाई-बंधु,
एक दूसरे को काट रहे थे,
और मैं रथ चला रहा था,
वो मुझे ही बांट रहे थे।
अर्जुन का मोह दूर किया,
पर मेरा दर्द किसने देखा?
भीष्म, द्रोण, कर्ण...
सबको मरते हुए मैंने देखा।
मत हार मान, मत हार मान...
जब मैं न रोया, तो तू क्यों परेशान?
मैंने कांटों पर चलकर भी मुस्कुराया है,
संघर्ष ही तो जीवन का दूसरा साया है।
गांधारी ने मुझे श्राप दिया...
कि मेरे पूरे वंश का नाश होगा।
मैं मुस्कुरा दिया...
क्योंकि मैं जानता था,
निर्माण के लिए विनाश होगा।
मैंने वो श्राप भी स्वीकार किया,
हंसते हुए।
अपनी आँखों के सामने,
अपनी द्वारका डूबते देखी,
अपने ही वंश को,
आपस में लड़ते, मरते देखी।
'एक तीर... बस एक तीर,
मेरे पैर में लगा,
वो शिकारी डरा हुआ था,
पर मैं जगा हुआ था।'
मैंने उससे कहा "डर मत,
ये मेरी ही इच्छा है।"
शरीर छोड़ना अंतिम सत्य,
यही शिक्षा है।
जन्म जेल में... मौत जंगल में...
न शुरुआत महल में,
न अंत महल में।
मत हार मान, मत हार मान...
जब मैं न रोया, तो तू क्यों परेशान?
मैंने कांटों पर चलकर भी मुस्कुराया है,
संघर्ष ही तो जीवन का दूसरा साया है।
'सुनो... अगर मैं...
भगवान होकर,
जन्म से मृत्यु तक,
संघर्ष कर सकता हूँ।
बिना शिकायत किए,
हमेशा मुस्कुरा सकता हूँ।
तो तुम... तुम क्यों टूट जाते हो?
तुम्हारी तकलीफें,
मेरे सामने कुछ भी नहीं।
'उठो! अपने आंसुओं को,
अपनी ताकत बनाओ।
दर्द को अपनी ढाल बनाओ।
जीवन फूलों की सेज नहीं,
कांटों का ताज है।
जो इस दर्द में भी मुस्कुरा दे,
वही असली महाराज है।
