दरसन बिना बहुत दिन बीते,
सुंदर प्रीतम मोर॥
प्राण कठोर,
अजहूँ न निकसै प्राण कठोर॥
चारि पहर चारों युग बीते,
रैनि गँवाई भोर॥
अवधि गई अजहूँ नहिं आये,
कतहूँ रहे चित चोर॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते,
सुंदर प्रीतम मोर॥
प्राण कठोर,
अजहूँ न निकसै प्राण कठोर॥
कबहूँ नैन निरखि नहिं देखे,
मारण चितवन तोर॥
दादू ऐसे आतुर बिरहणि,
जैसे चंद चकोर॥
प्राण कठोर,
अजहूँ न निकसै प्राण कठोर॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते,
सुंदर प्रीतम मोर॥
प्राण कठोर,
अजहूँ न निकसै प्राण कठोर॥
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