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राम भजन
राम... मेरे राम...
आओ मेरे राम...
वन-वन तेरी राह निहारी,
साँझ हुई फिर भोर।
सूनी झोपड़िया आज पुकारे,
आ जाओ रघुवर मोर।
हर इक पत्ती, नाम है लेती,
हर इक डाली ध्यान।
तेरे चरणों की आहट सुनकर,
धड़के मेरे प्राण।
रोज़ बुहारूँ तेरी डगरिया,
सजती मेरी आस।
कब आओगे रघुनंदन मेरे,
बीते कितने मास।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
मीठे-मीठे बेर सँभाले,
प्रेम से रोज़ सजाए।
हर फल चखकर यही सोचा,
राम मधुर मुस्काएँ।
थाली छोटी, भाव अनोखा,
मन में असीम सम्मान।
भक्ति के आगे झुक जाए,
राजा हो या भगवान।
धन न माँगूँ, मान न चाहूँ,
न चाहूँ कोई नाम।
बस इक पल को चरण छू लूँ,
पूरा हो अरमान।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
आख़िर वो शुभ घड़ी भी आई,
कुटिया हुई उजियार।
राम स्वयं मुस्काते आए,
संग चले लक्ष्मण कुमार।
काँप रहे थे हाथ शबरी के,
भीग गए थे नैन।
राम ने प्रेम से बेर जो खाए,
मिट गए सब चैन।
प्रेम जहाँ हो निर्मल इतना,
वहीं बसे भगवान।
भक्ति जहाँ हो निष्कलुष ऐसी,
वहीं बने तीर्थस्थान।
ऊँच-नीच का भेद मिटाकर,
दिया जगत को ज्ञान।
भाव बड़ा है, भोग से बढ़कर,
यही कहें भगवान।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
मेरे राम पधारो,
मेरे द्वार पधारो।
सूनी मेरी साँसों में,
अपने चरण उतारो।।
जय श्रीराम... जय श्रीराम...
जय श्रीराम... जय श्रीराम...
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