‘परमा‘ शब्द का अर्थ होता है सर्वोत्तम अथवा श्रेष्ठ। इसी कारण इस एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष फलदायी माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार धन के देवता कुबेर ने इसी व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद पाया था। परमा एकादशी व्रत के प्रभाव से धन, धान्य, यश और सम्मान में वृद्धि होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि जो भक्त इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे मृत्यु के पश्चात बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
परमा एकादशी व्रत कथा
अर्जुन बोले हे जनार्दन ! आप अधिक मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम तथा उसके व्रत की विधि बतलाइये। इसमें किस देवता की पूजा की जाती है तथा इसके व्रत से क्या फल मिलता है? श्रीकृष्ण बोले हे पार्थ ! इस एकादशी का नाम 'परमा' है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेध, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए। महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा काम्पिल्य नगरी में हुई थी, कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो
काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी। पूर्व के किसी पाप के कारण यह दम्पति अत्यन्त दरिद्र था। उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सेवा करती रहती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी । एक दिन सुमेधा अपनी पत्नी से बोला 'हे प्रिये ! गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती इसलिए मैं परदेश जाकर कुछ उद्योग करूँ ।'
उसकी पत्नी बोली 'हे प्राणनाथ ! पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए । मनुष्य को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मिलता है। विधाता ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह टाले से भी नहीं टलता। हे प्राणनाथ आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जायेगा ।'
पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। एक समय कौण्डिन्य मुनि उस जगह आये । उन्हें देखकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया और बोले 'आज हम धन्य हुए, आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ।' मुनि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया ।
भोजन के पश्चात् पतिव्रता बोली 'हे मुनिवर! मेरे भाग्य से आप आ गये हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है। आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बतायें ।' इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले 'अधिक मास' की कृष्णपक्ष की 'परमा एकादशी के व्रत से समस्त पाप, दुःख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है। इस व्रत में कीर्तन भजन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए । महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया है।'
फिर मुनि कौण्डिन्य ने उन्हें 'परमा एकादशी' के व्रत की विधि कह सुनायी। मुनि बोलेः 'हे ब्राह्मणी । इस दिन प्रातः काल नित्यकर्म से निवृत होकर विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए । जो मनुष्य पाँच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने माता पिता और स्त्रीसहित स्वर्गलोक को जाते हैं। हे ब्राह्मणी तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को करो। इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी ।'
कौण्डिन्य मुनि के कहे अनुसार उन्होंने 'परमा एकादशी' का पाँच दिन तक व्रत किया । व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते हुए देखा। राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, रहने के लिए दिया। दोनों इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में अनन्त सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गये ।
हे पार्थ ! जो मनुष्य 'परमा एकादशी' का व्रत करता है, उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है। जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गौ, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं । उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है। इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है।
परमा एकादशी व्रत पूजा विधि
परमा एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि करके स्वच्छ और पीले रंग के वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प करें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का उच्चारण करते हुए पंचामृत से भगवान का स्नान कराएं। भगवान को वस्त्र, चंदन, जनेऊ, गंध, अक्षत, पुष्प, तिल, धूप-दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, पान, नारियल आदि अर्पित करें।
घी का दीपक जलाएं और कपूर से आरती उतारें। इसके बाद परमा एकादशी की कथा का श्रवण या वाचन करें। पूरे दिन विष्णु जी के नाम का जप एवं कीर्तन करते हुए यह व्रत पूरा करना चाहिए।
अर्जुन बोले हे जनार्दन ! आप अधिक मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम तथा उसके व्रत की विधि बतलाइये। इसमें किस देवता की पूजा की जाती है तथा इसके व्रत से क्या फल मिलता है? श्रीकृष्ण बोले हे पार्थ ! इस एकादशी का नाम 'परमा' है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेध, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए। महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा काम्पिल्य नगरी में हुई थी, कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो
काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी। पूर्व के किसी पाप के कारण यह दम्पति अत्यन्त दरिद्र था। उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सेवा करती रहती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी । एक दिन सुमेधा अपनी पत्नी से बोला 'हे प्रिये ! गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती इसलिए मैं परदेश जाकर कुछ उद्योग करूँ ।'
उसकी पत्नी बोली 'हे प्राणनाथ ! पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए । मनुष्य को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मिलता है। विधाता ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह टाले से भी नहीं टलता। हे प्राणनाथ आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जायेगा ।'
पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। एक समय कौण्डिन्य मुनि उस जगह आये । उन्हें देखकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया और बोले 'आज हम धन्य हुए, आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ।' मुनि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया ।
भोजन के पश्चात् पतिव्रता बोली 'हे मुनिवर! मेरे भाग्य से आप आ गये हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है। आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बतायें ।' इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले 'अधिक मास' की कृष्णपक्ष की 'परमा एकादशी के व्रत से समस्त पाप, दुःख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है। इस व्रत में कीर्तन भजन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए । महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया है।'
फिर मुनि कौण्डिन्य ने उन्हें 'परमा एकादशी' के व्रत की विधि कह सुनायी। मुनि बोलेः 'हे ब्राह्मणी । इस दिन प्रातः काल नित्यकर्म से निवृत होकर विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए । जो मनुष्य पाँच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने माता पिता और स्त्रीसहित स्वर्गलोक को जाते हैं। हे ब्राह्मणी तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को करो। इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी ।'
कौण्डिन्य मुनि के कहे अनुसार उन्होंने 'परमा एकादशी' का पाँच दिन तक व्रत किया । व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते हुए देखा। राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, रहने के लिए दिया। दोनों इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में अनन्त सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गये ।
हे पार्थ ! जो मनुष्य 'परमा एकादशी' का व्रत करता है, उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है। जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गौ, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं । उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है। इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है।
