हनुमान भजन
वीर भी, विनम्र भी, तू ही असली शक्ति,
झुककर जीता जग को, यही तेरी भक्ति।
बल में अग्नि जैसी, मन में शांति भरी,
तेरे जैसा ना कोई, तू ही महाशक्ति।
बालपन में सूरज को फल समझ लिया,
आकाश की सीमा को भी छू लिया।
देवों ने देखा तेरा अदभुत ये रूप,
पर तूने गुरु मान सूर्य को सिर झुका लिया।
ज्ञान की किरणों से खुद को सजाया,
अहंकार का एक कण भी ना आने पाया।
तेज तेरा ज्वाला, पर स्वभाव तेरा जल,
शक्ति के साथ विनम्रता को अपनाया।
वीर भी, विनम्र भी, तू ही असली शक्ति,
झुककर जीता जग को, यही तेरी भक्ति।
बल में अग्नि जैसी, मन में शांति भरी,
तेरे जैसा ना कोई, तू ही महाशक्ति।
समुद्र को लांघा एक ही उछाल में,
राम नाम गूंजा तेरे हर ख्याल में।
लंका में जाकर अधर्म को जला दिया,
सत्य की लौ जली तेरे हर सवाल में।
रावण की सभा में खड़ा रहा निडर,
पर वाणी मेंआदर, न कोई प्रहार उधर।
वीरता तेरी गरजी जैसी गरजन,
पर झुककर दिखाया तूने असली सफर।
वीर भी, विनम्र भी, तू ही असली शक्ति,
झुककर जीता जग को, यही तेरी भक्ति।
बल में अग्नि जैसी, मन में शांति भरी,
तेरे जैसा ना कोई, तू ही महाशक्ति।
संजीवनी पर्वत उठा लिया हाथों में,
मृत्यु को हराया अपने ही साथ में।
लक्ष्मण में फिर से जीवन जगा दिया,
नाम लिखा गया तेरे हर एक बातों में।
राम के चरणों में सब कुछ अर्पण,
खुद को बताया सदा उनका सेवक बन।
इतनी शक्ति, फिर भी इतना विनम्र,
यहीं बनाता तुझे सबसे महान।
ना तुझ में घमंड, ना तुझ में दिखावा,
भक्ति में डूबा तेरा हर एक छावा।
तूने सिखाया क्या होता है धर्म,
झुककर ही मिलता सच्चा प्रभाव।
वीर भी, विनम्र भी, तू ही असली शक्ति,
झुककर जीता जग को, यही तेरी भक्ति।
बल में अग्नि जैसी, मन में शांति भरी,
तेरे जैसा ना कोई, तू ही महाशक्ति।
जय जय हनुमान, गूंजे हर दिशा,
तेरे नाम से ही मिटे हर व्यथा।
वीर भी, विनम्र भी ये गाथा तेरी,
भक्ति में डूबे रहे ये जग सारा।
