जातस्य हि ध्रुवो
मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे
न त्वं शोचितुमर्हसि॥
राख का टीला मत समझो,
ये तो बस विश्राम है,
शून्य के गर्भ में पल रहा,
एक नया आयाम है।
ध्वंस के सन्नाटे में,
गूँजती हुंकार हूँ,
काल के कपाल पर,
मैं समय की मार हूँ,
जो जला वो नष्ट नहीं,
वो अग्नि का ही रूप है,
छाँव जिसकी मृत्यु है,
वो जीवन की धूप है,
मिट गया आकार जो,
वो निराकार में ढल गया,
सूरज अगर डूबा यहाँ,
तो कहीं और गया,
पूर्णविराम नहीं ये,
ये नया अध्याय है,
सृजन और विनाश का,
ये महा-न्याय है,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः।
भस्म रमी है देह पर,
रगों में बहता लौह है,
खंडहरों की ईट में,
छिपा हुआ विद्रोह है,
चोट जितनी गहरी हो,
नशा उतना घोर है,
रात जितनी काली हो,
समीप उतनी भोर है,
वज्र सा कठोर मन,
नियति का ये खेल है,
साँस की लकीर का,
और मौत का ये मेल है,
मैं गिरूँगा टूटूँगा,
पर फिर खड़ा हो जाऊँगा,
बीज हूँ पाताल का,
चट्टान चीर आऊँगा।
अनादि: आदि:
अनंत: अंत:
पुनश्चरामी, पुनश्चरामी,
डर नहीं विलीन होने का,
कि मिट्टी ही तो सोना है,
जो आज यहाँ शमशान है,
कल वही बिछौना है,
चक्र चलता जाएगा,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः,
अंतः अस्ति प्रारंभः।
